बुधवार, अगस्त 10, 2011

प्रशासन और साहित्य का अदभुत संगम : कृष्ण कुमार यादव


प्रशासनिक सेवा में रहकर चिन्तन मनन करना एवं साहित्यिक लेखन करना अपने आप में एक विशिष्ट उपलब्धि है। राजकीय सेवा के दायित्वों का निर्वहन और श्रेष्ठ कृतियों की सर्जना का यह मणि-कांचन योग विरले ही मिलता है। कृष्ण कुमार यादव इस विरल योग के ही प्रतीक हैं। सम्प्रति आप भारतीय डाक सेवा के अधिकारी के रूप में अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ हैं. देश की तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन के अलावा उनके कृतित्व में एक काव्यसंकलन "अभिलाषा" सहित दो निबंध-संकलन "अभिव्यक्तियों के बहाने" तथा "अनुभूतियाँ और विमर्श" एवं संपादित कृति "क्रांति-यज्ञ" का प्रकाशन शामिल है. इसके अलावा भारतीय डाक पर अंग्रेजी में लिखी उनकी पुस्तक ''India Post : 150 Glorious Years'' काफी चर्चित रही है. विभिन्न संकलनों में इनकी रचनाएँ सुशोभित हैं तो आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर, पोर्टब्लेयर से समय-समय पर कविताओं, सामयिक लेख, वार्ता का भी प्रसारण होता रहा है. अंतर्जाल पर 'शब्द सृजन की ओर', 'डाकिया डाक लाया' और 'आजमगढ़ ब्लागर्स एसोसिएशन' ब्लॉग का सञ्चालन भी कर रहे हैं।

श्री यादव के इस बहुआयामी व्यक्तित्व के चलते ही उनके व्यक्तित्व-कृतित्व पर "बाल साहित्य समीक्षा (संपादक : डा0 राष्ट्रबंधु, कानपुर)" व "गुफ्तगू (संपादक : मुo गाजी, इलाहाबाद)" पत्रिकाओं द्वारा विशेषांक जारी किये गए हैं तो शोधार्थियों हेतु व्यक्तित्व-कृतित्व पर इलाहाबाद से "बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव" (सं0- दुर्गाचरण मिश्र) पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है. श्री यादव को साहित्य विरासत की बजाय आत्मान्वेषण और आत्मभिव्यक्ति के संघर्ष से प्राप्त हुआ है। निरन्तर सजग होते आत्मबोध ने उनकी विलक्षण रचनाधर्मिता को प्रखरता और सोद्देश्यता से सम्पन्न किया है। उनकी रचनाओं में मात्र कोरी बौद्धिकता नहीं, जीवन सम्बन्धी आत्मीय अनुभूतियाँ हैं, संवेदनात्मक संस्पर्श हैं, सामाजिक संचेतना है, समय की जटिलताओं के मध्य भावों की संप्रेषणीयता है। सारगर्भित, सुन्दर, सुस्पष्ट व सार्थक रूप में इन रचनाओं में जीवन की लय है, विचार हैं, प्रभान्विति है, जिसके चलते अपनी रचनाओं में श्री यादव विषय-वस्तुओं का यथार्थ विशेलषण करते हुये उनका असली चेहरा पाठकों के सामने प्रस्तुत करते हैं। बकौल पद्मभूषण गोपाल दास ‘नीरज‘ -‘‘कृष्ण कुमार यादव यद्यपि एक उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी हैं, किन्तु फिर भी उनके भीतर जो एक सहज कवि है वह उन्हें एक श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में प्रस्तुत करने के लिए निरन्तर बेचैन रहता है। उनमें बुद्धि और हृदय का एक अपूर्व सन्तुलन है। वो व्यक्तिनिष्ठ नहीं समाजनिष्ठ कवि हैं जो वर्तमान परिवेश की विद्रूपताओं, विसंगतियों, षडयन्त्रों और पाखण्डों का बड़ी मार्मिकता के साथ उद्घाटन करते हैं।’’



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आज कृष्ण कुमार जी का जन्म-दिन है. कृष्ण कुमार जी को जन्मदिन पर बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं! आने वाला प्रत्येक नया दिन, आपके , आकांक्षा जी, अक्षिता (पाखी) और तन्वी के जीवन में अनेकानेक सफलताएँ एवं अपार खुशियाँ लेकर आए! इस अवसर पर ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह, वैभव, ऐश्वर्य, उन्नति, प्रगति, आदर्श, स्वास्थ्य, प्रसिद्धि और समृद्धि के साथ सपरिवार, आजीवन आपको जीवन पथ पर गतिमान रखे !!

शनिवार, जुलाई 30, 2011

रचनाधर्मिता के पैमाने पर आकांक्षा यादव

ब्लागिंग-जगत में बहुत कम लोग ऐसे हैं, जो एक साथ ही प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में भी निरंतर छप रहे हैं. इन्हीं में से एक नाम है-आकांक्षा यादव जी का. आकांक्षा जी कॉलेज में प्रवक्ता के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लाॅगिंग के क्षेत्र में भी उतनी ही प्रवृत्त हैं।

इण्डिया टुडे, कादम्बिनी, नवनीत, साहित्य अमृत, वर्तमान साहित्य, अक्षर पर्व, अक्षर शिल्पी, युगतेवर, आजकल, उत्तर प्रदेश, मधुमती, हरिगंधा, पंजाब सौरभ, हिमप्रस्थ, दैनिक जागरण, जनसत्ता, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, स्वतंत्र भारत, राजस्थान पत्रिका, वीणा, अलाव, परती पलार, हिन्दी चेतना (कनाडा), भारत-एशियाई साहित्य, शुभ तारिका, राष्ट्रधर्म, पांडुलिपि, नारी अस्मिता, चेतांशी, बाल भारती, बाल वाटिका, गुप्त गंगा, संकल्य, प्रसंगम, पुष्पक, गोलकोंडा दर्पण इत्यादि शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित आकांक्षा यादव अंतर्जाल पर भी उतनी ही सक्रिय हैं. विभिन्न वेब पत्रिकाओं- अनुभूति, सृजनगाथा, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, वेब दुनिया हिंदी, रचनाकार, ह्रिन्द युग्म, हिंदीनेस्ट, हिंदी मीडिया, हिंदी गौरव, लघुकथा डाट काम, उदंती डाट काम, कलायन, स्वर्गविभा, हमारी वाणी, स्वतंत्र आवाज डाट काम, कवि मंच, इत्यादि पर आपकी रचनाओं का प्रकाशन निरंतर होता रहता है. विकिपीडिया पर भी आपकी तमाम रचनाओं के लिंक उपलब्ध हैं।

अपने व्यक्तिगत ब्लॉग 'शब्द-शिखर' के साथ-साथ पतिदेव कृष्ण कुमार जी के साथ युगल रूप में बाल-दुनिया, सप्तरंगी प्रेम, उत्सव के रंग ब्लॉगों का सञ्चालन उन्हें अग्रणी महिला ब्लागरों की पंक्ति में खड़ा करता है. इसके अलावा भी वे तमाम ब्लॉगों से जुडी हुयी हैं.

30 जुलाई, 1982 को सैदपुर, गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मीं और सम्प्रति भारत के सुदूर अंडमान में हिंदी ब्लागिंग की पताका फहरा रहीं आकांक्षा जी न सिर्फ हिंदी को लेकर सचेत हैं बल्कि इसके प्रचार-प्रसार में भी भूमिका निभा रही हैं. दो दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित पुस्तकों/ संकलनों में उनकी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं तो आकाशवाणी से भी रचनाएँ तरंगित होती रहती हैं. नारी विमर्श, बाल विमर्श और सामाजिक मुद्दों से सम्बंधित विषयों पर आप प्रमुखता से लेखन कर रही हैं. कृष्ण कुमार जी के साथ "क्रांति-यज्ञ:1857-1947 की गाथा" पुस्तक का संपादन कर चुकीं आकांक्षा जी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर चर्चित बाल-साहित्यकार डा. राष्ट्रबंधु द्वारा सम्पादित "बाल साहित्य समीक्षा (कानपुर)" पत्रिका ने विशेषांक भी जारी किया है।


विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थानों द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु उन्हें दर्जनाधिक सम्मान, पुरस्कार और मानद उपाधियाँ प्राप्त हैं. भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ’भारती ज्योति’, ‘‘एस0एम0एस0‘‘ कविता पर प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा पुरस्कार सहित तमाम सम्मान शामिल हैं. आकांक्षा जी के पतिदेव श्री कृष्ण कुमार यादव भी चर्चित साहित्यकार और ब्लागर हैं, वहीँ इस दंपत्ति की पुत्री अक्षिता (पाखी) भी 'पाखी की दुनिया' के माध्यम से अभिव्यक्त होती रहती है. सहजता और विनम्रता की प्रतिमूर्ति आकांक्षा यादव अपनी रचनाधर्मिता के बारे में कहती हैं कि-'' मैंने एक रचनाधर्मी के रूप में रचनाओं को जीवंतता के साथ सामाजिक संस्कार देने का प्रयास किया है. बिना लाग-लपेट के सुलभ भाव-भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य उभरें, यही मेरी लेखनी की शक्ति है.''

आशा की जानी चाहिए कि आकांक्षा जी यूँ ही अपने लेखन में धार बनाये रखें, निरंतर लिखती-छपती रहें और हिंदी साहित्य और ब्लागिंग को समृद्ध करती रहें.

जन्म-दिन पर असीम शुभकामनाओं सहित...!!

गुरुवार, जुलाई 14, 2011

हमारा भी जन्म-दिन आ गया...


लीजिये जी, आज हमारा जन्म-दिन है. आप सबके लिए यह केक हमारी तरफ से. इसे खाएं और जन्मदिन की बधाई देना ना भूलें !!

मंगलवार, जून 28, 2011

कृष्ण कुमार यादव के संपादन में प्रकाशित 'सरस्वती सुमन' का लघुकथा विशेषांक अंडमान में लोकार्पित

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर में सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था ‘चेतना’ के तत्वाधान में स्वर्गीय सरस्वती सिंह की 11 वीं पुण्यतिथि पर 26 जून, 2011 को मेगापोड नेस्ट रिसार्ट में आयोजित एक कार्यक्रम में देहरादून से प्रकाशित 'सरस्वती सुमन' पत्रिका के लघुकथा विशेषांक का विमोचन किया गया. इस अवसर पर ''बदलते दौर में साहित्य के सरोकार'' विषय पर संगोष्ठी का आयोजन भी किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में श्री एस. एस. चौधरी, प्रधान वन सचिव, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, अध्यक्षता देहरादून से पधारे डा. आनंद सुमन 'सिंह', प्रधान संपादक-सरस्वती सुमन एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, डा. आर. एन. रथ, विभागाध्यक्ष, राजनीति शास्त्र, जवाहर लाल नेहरु राजकीय महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर एवं डा. जयदेव सिंह, प्राचार्य टैगोर राजकीय शिक्षा महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर उपस्थित रहे. कार्यक्रम का आरंभ पुण्य तिथि पर स्वर्गीय सरस्वती सिंह के स्मरण और तत्पश्चात उनकी स्मृति में जारी पत्रिका 'सरस्वती सुमन' के लघुकथा विशेषांक के विमोचन से हुआ. इस विशेषांक का अतिथि संपादन चर्चित साहित्यकार और द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवा श्री कृष्ण कुमार यादव द्वारा किया गया है. अपने संबोधन में मुख्य अतिथि एवं द्वीप समूह के प्रधान वन सचिव श्री एस.एस. चौधरी ने कहा कि सामाजिक मूल्यों में लगातार गिरावट के कारण चिंताजनक स्थिति पैदा हो गई है । >ऐसे में साहित्यकारों को अपनी लेखनी के माध्यम से जन जागरण अभियान शुरू करना चाहिए । उन्होंने कहा कि आज के समय में लघु कथाओं का विशेष महत्व है क्योंकि इस विधा में कम से कम शब्दों के माध्यम से एक बड़े घटनाक्रम को समझने में मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि देश-विदेश के 126 लघुकथाकारों की लघुकथाओं और 10 सारगर्भित आलेखों को समेटे सरस्वती सुमन के इस अंक का सुदूर अंडमान से संपादन आपने आप में एक गौरवमयी उपलब्धि मानी जानी चाहिए.

युवा साहित्यकार एवं निदेशक डाक सेवा श्री कृष्ण कुमार यादव ने बदलते दौर में लघुकथाओं के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि भूमण्डलीकरण एवं उपभोक्तावाद के इस दौर में साहित्य को संवेदना के उच्च स्तर को जीवन्त रखते हुए समकालीन समाज के विभिन्न अंतर्विरोधों को अपने आप में समेटकर देखना चाहिए एवं साहित्यकार के सत्य और समाज के सत्य को मानवीय संवेदना की गहराई से भी जोड़ने का प्रयास करना चाहिये। श्री यादव ने समाज के साथ-साथ साहित्य पर भी संकट की चर्चा की और कहा कि संवेदनात्मक सहजता व अनुभवीय आत्मीयता की बजाय साहित्य जटिल उपमानों और रूपकों में उलझा जा रहा है, ऐसे में इस ओर सभी को विचार करने की जरुरत है.

संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए डा. जयदेव सिंह, प्राचार्य टैगोर राजकीय शिक्षा महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर ने कहा कि साहित्य के क्षेत्र में समग्रता के स्थान पर सीमित सोच के कारण उन विषयों पर लेखन होने लगा है जिनका सामाजिक उत्थान और जन कल्याण से कोई सरोकार नहीं है । केंद्रीय कृषि अनुसन्धान संस्थान के निदेशक डा. आर. सी. श्रीवास्तव ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि आज बड़े पैमाने पर लेखन हो रहा है लेकिन रचनाकारों के सामने प्रकाशन और पुस्तकों के वितरण की समस्या आज भी मौजूद है । उन्होंने समाज में नैतिकता और मूल्यों के संर्वधन में साहित्य के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला । डा. आर. एन. रथ, विभागाध्यक्ष, राजनीति शास्त्र, जवाहर लाल नेहरु राजकीय महाविद्यालय ने अंडमान के सन्दर्भ में भाषाओँ और साहित्य की चर्चा करते हुए कहा कि यहाँ हिंदी का एक दूसरा ही रूप उभर कर सामने आया है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि साहित्य का एक विज्ञान है और यही उसे दृढ़ता भी देता है.अंडमान से प्रकाशित एकमात्र साहित्यिक पत्रिका 'द्वीप लहरी' के संपादक डा. व्यास मणि त्रिपाठी ने ने साहित्य में उभरते दलित विमर्श, नारी विमर्श, विकलांग विमर्श को केन्द्रीय विमर्श से जोड़कर चर्चा की और बदलते दौर में इसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया. उन्होंने साहित्य पर हावी होते बाजारवाद की भी चर्चा की और कहा कि कला व साहित्य को बढ़ावा देने के लिए लोगों को आगे आना होगा। पूर्व प्राचार्य डा. संत प्रसाद राय ने कहा कि कहा कि समाज और साहित्य एक सिक्के के दो पहलू हैं और इनमें से यदि किसी एक पर भी संकट आता है, तो दूसरा उससे अछूता नहीं रह सकता।

कार्यक्रम के अंत में अपने अध्यक्षीय संबोधन में ‘‘सरस्वती सुमन’’ पत्रिका के प्रधान सम्पादक डाॅ0 आनंद सुमन सिंह ने पत्रिका के लघु कथा विशेषांक के सुन्दर संपादन के लिए श्री कृष्ण कुमार यादव को बधाई देते हुए कहा कि कभी 'काला-पानी' कहे जानी वाली यह धरती क्रन्तिकारी साहित्य को अपने में समेटे हुए है, ऐसे में 'सरस्वती सुमन' पत्रिका भविष्य में अंडमान-निकोबार पर एक विशेषांक केन्द्रित कर उसमें एक आहुति देने का प्रयास करेगी. उन्होंने कहा कि सुदूर विगत समय में राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तमाम घटनाएं घटी हैं और साहित्य इनसे अछूता नहीं रह सकता है। अपने देश में जिस तरह से लोगों में पाश्चात्य संस्कृति के प्रति अनुराग बढ़ रहा है, वह चिन्ताजनक है एवं इस स्तर पर साहित्य को प्रभावी भूमिका का निर्वहन करना होगा। उन्होंने रचनाकरों से अपील की कि वे सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को ध्यान में रखकर स्वास्थ्य समाज के निर्माण में अपनी रचनात्मक भूमिका निभाएं। इस अवसर पर डा. सिंह ने द्वीप समूह में साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए और स्व. सरस्वती सिंह की स्मृति में पुस्तकालय खोलने हेतु अपनी ओर से हर संभव सहयोग देने का आश्वासन दिया।

कार्यक्रम के आरंभ में संस्था के संस्थापक महासचिव दुर्ग विजय सिंह दीप ने अतिथियों और उपस्थिति का स्वागत करते हुए आज के दौर में हो रहे सामाजिक अवमूल्यन पर चिंता व्यक्त की । कार्यक्रम का संचालन संस्था के उपाध्यक्ष अशोक कुमार सिंह ने किया और संस्था की निगरानी समिति के सदस्य आई.ए. खान ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर विभिन्न द्वीपों से आये तमाम साहित्यकार, पत्रकार व बुद्धिजीवी उपस्थित थे.

प्रस्तुति : दुर्ग विजय सिंह दीप
संयोजक- 'चेतना' (सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था)
उपनिदेशक- आकाशवाणी (समाचार अनुभाग)
पोर्टब्लेयर -744102

सोमवार, मई 09, 2011

वर्ष की श्रेष्ठ नन्हीं ब्लागर अवार्ड बनीं अक्षिता (पाखी) ..'निशंक' ने दिया सम्मान

नन्हीं ब्लॉगर अक्षिता यादव 'पाखी' को श्रेष्ठ नन्हीं ब्लॉगर के लिए 'हिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान-2010' अवार्ड दिया गया है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक, हिंदी कवि एवं साहित्यकार अशोक चक्रधर, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ रामदरश मिश्र, प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे साहित्यकारों की उपस्थिति में 30 अप्रैल को हिंदी भवन में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर्स सम्मलेन में हिंदी साहित्य निकेतन, परिकल्पना डॉट कॉम और नुक्कड़ डॉट कॉम की त्रिवेणी ने हिंदी ब्लॉगिंग के उत्थान में अविस्मरणीय योगदान के लिए और भी 51 हिंदी ब्लॉगरों को यह सम्मान दिया। सबसे कम उम्र की अक्षिता पाखी का नाम इस सूची में सबसे ऊपर था। इन सभी को स्मृति चिन्ह, सम्मान पत्र, पुस्तकें और एक निश्चित धनराशि भी दी गई।

कानपुर में 25 मार्च 2007 को जन्मी अक्षिता इस समय पोर्टब्लेयर में कार्मेल स्कूल में केजी में पढ़ती है। अक्षिता का ब्लॉग 24 जून 2009 को 'पाखी की दुनिया' http://www.pakhi-akshita.blogspot.com नाम से अस्तित्व में आया। इस ब्लॉग पर उसने अन्य विषयों के साथ-साथ अंडमान के बारे में भी काफी जानकारियां और फोटोग्राफ पोस्ट किए हैं, जिन्हें यूजर्स काफी उत्सुकता से पढ़ते और सराहते हैं। इस ब्लॉग पर 150 से भी ज्यादा पोस्ट प्रकाशित हो चुकी हैं और 140 से ज्यादा लोग इसका अनुसरण करते हैं। ब्लॉग का संचालन अक्षिता के माता-पिता करते हैं। अक्षिता के पिता कृष्ण कुमार यादव अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएं हैं और माँ आकांक्षा यादव उत्तर प्रदेश में एक कॉलेज में प्रवक्ता हैं।

दिल्ली से प्रकाशित अनेक समाचार पत्रों ने अक्षिता के लिए लिखा है कि अक्षिता बहुत छोटी है, लेकिन हिंदी ब्लॉगिंग में वह एक जाना-पहचाना नाम बन चुकी है। उसका ब्लॉग बेहद लोकप्रिय है और फिलहाल हिंदी के टॉप 100 ब्लॉगों में से एक है। अक्षिता की तस्वीर बच्चों की एक पुस्तक के कवर पर भी छप चुकी है। इससे पूर्व अक्षिता पाखी को लोकसंघर्ष-परिकल्पना और लखनऊ ब्लॉगर्स एसोसिएशन के सह प्रायोजित ब्लॉगोत्सव-2010 में प्रकाशित रचनाओं की श्रेष्ठता के आधार पर वर्ष 2010 के लिए श्रेष्ठ नन्हीं ब्लॉगर का पुरस्कार मिल चुका है। अक्षिता सम्मान ग्रहण करने नहीं पहुंच सकी, इसलिए यह सम्मान उसके चाचा अमित कुमार यादव ने ग्रहण किया। मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक, नन्हीं ब्लॉगर को यह पुरस्कार देते हुए उत्सुकता और भारी प्रसन्नता व्यक्त की।




मंगलवार, अप्रैल 19, 2011

राम राम शिव मूर्ति यादव को ‘अम्बेडकर रत्न अवार्ड 2011‘ सम्मान

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित चारबाग के रवीन्द्रालय सभागार में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में प्रखर लेखक एवं समाज सेवी श्री राम शिव मूर्ति यादव को ‘अम्बेडकर रत्न अवार्ड 2011‘ से सम्मानित किया गया। उक्त समारोह में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया के अध्यक्ष श्री रामदास आठवले ने श्री यादव को यह सम्मान प्रदान किया एवं अम्बेडकरवादी साहित्य को प्रोत्साहित करने एवं तत्संबंधी लेखन हेतु उनके कार्य-कलापों की प्रशंसा करते हुए उसे समाज के लिए अनुकरणीय बताया। इस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के 120 अम्बेडकरवादियों को सम्मानित किया गया।

उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी पद से सेवानिवृत्ति पश्चात तहबरपुर-आजमगढ़ जनपद निवासी श्री राम शिव मूर्ति यादव एक लम्बे समय से शताधिक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक विषयों पर प्रखरता से लेखन कर रहे हैं। श्री यादव की ‘सामाजिक व्यवस्था एवं आरक्षण‘ नाम से एक पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है। आपके तमाम लेख विभिन्न स्तरीय पुस्तकों और संकलनों में भी प्रकाशित हैं। इसके अलावा आपके लेख इंटरनेट पर भी तमाम चर्चित वेब/ई/ऑनलाइन पत्र-पत्रिकाओं और ब्लाग्स पर पढ़े-देखे जा सकते हैं। श्री राम शिव मूर्ति यादव ब्लागिंग में भी सक्रिय हैं और ”यदुकुल” (www.yadukul.blogspot.com) ब्लॉग का आप द्वारा 10 नवम्बर 2008 से सतत संचालन किया जा रहा है।

इससे पूर्व आपको भारतीय दलित साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने सामाजिक न्याय सम्बन्धी लेखन एवं समाज सेवा के लिए ‘’ज्योतिबाफुले फेलोशिप सम्मान-2007‘‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ, इलाहाबाद ने विशिष्ट कृतित्व एवं समृद्ध साहित्य-साधना हेतु ‘‘भारती ज्योति’’ सम्मान एवं आसरा समिति, मथुरा ने ‘बृज गौरव‘, म0प्र0 की प्रतिष्ठित संस्था ‘समग्रता‘ शिक्षा साहित्य एवं कला परिषद, कटनी ने हिन्दी साहित्य सेवा के आधार पर वर्ष 2010 के लिए रचनात्मक क्षेत्र में सेवाओं के निमित्त ”भारत-भूषण“ की मानद उपाधि से अलंकृत किया है।

गोवर्धन यादव
संयोजक-राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, छिन्दवाड़ा
103 कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा (म0प्र0)-480001

सोमवार, अप्रैल 18, 2011

एक युवा रचनाधर्मी का सतत मूल्यांकन

साहित्य और साहित्यकार दोनों एक ही नव निर्माण प्रक्रिया के दो पहलू होते हैं। इस दृष्टि से किसी भी साहित्यकार के कृतित्व के अध्ययन के लिए उसके व्यक्तित्व का अध्ययन महत्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि सर्जक व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक घटनाएँ जैसे पूर्व संस्कार, बचपन के संस्कार, पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक इत्यादि का कलाकार एवं सर्जक के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति अगर साहित्यकार हो तो उसके कृतित्व में किसी न किसी रूप में उसके व्यक्तित्व की झलक स्पष्ट दिखाई दे जाती है। इन स्थितियों के लिये तत्कालीन देश, काल एवं वातावरण की अहम् भूमिका होती है। दुर्गाचरण मिश्र द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर: कृष्ण कुमार यादव‘‘ को इसी परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की आवश्यकता है।

33 वर्षीय युवा कृष्ण कुमार यादव भारतीय डाक सेवा के उच्च पदस्थ अधिकारी हैं, कवि हैं, कहानीकार हैं, निबंधकार हैं, बाल साहित्यकार हैं, संपादन कला में भी दक्ष हैं। अपनी साहित्यिक रचनाधर्मिता के साथ-साथ वह प्रकृति-प्रेमी, पर्यटक, समाजसेवी, स्वाध्याय प्रेमी, संगीत श्रोता, स्नेही मित्र और कुशल प्रशासक भी हैं। उनके लिए साहित्य मात्र उत्सवधर्मिता का परिचायक नहीं बल्कि उसके माध्यम से वे जीवन के रंगों और उसमें व्याप्त आनंद की खोज व अन्वेषण करते हैं। अपने इन्हीं विशिष्ट गुणों के कारण कृष्ण कुमार अपनी जीवन-संगिनी आकांक्षा के वरेण्य बने हुए हैं। बेटी के प्रति वात्सल्य-वर्षण में दम्पति युग्म प्रतिस्पर्धी है। कृष्ण कुमार का व्यक्तित्व पिताश्री की कर्तव्यनिष्ठा, अध्ययन, अभिरुचि, लेखन का अभ्यास, लक्ष्य प्राप्ति हेतु अथक प्रयास तथा सरलमना ममतामयी माँ के उत्सर्ग-परायण अन्तःकरण का सुखद समन्वय प्रतीत होता है। उनका प्रियदर्शन व्यक्तित्व सर्वाधिक आकर्षक एवं सम्मोहक है। प्रसाद जी की पंक्ति याद आती है- हृदय की अनुकृति बाह्य उदार एक लम्बी काया उन्मुक्त।

‘बढ़ते चरण शिखर की ओर‘ में कृष्ण कुमार के समग्र साहित्यिक कृतित्व का मूल्यांकन किया गया है। विद्वान समीक्षकों ने विभिन्न विधाओं में सृजित श्री यादव की रचनाओं की मुक्तकण्ठ से सराहना की है। उनकी रचनाओं में सामाजिक सरोकारों की प्रतिबद्धता, परिवारिक रिश्तों की मिठास, भारतीय संस्कृति के प्रेरक आदर्श, दलितों-शोषितों के प्रति सहज सहानुभूति, ममतामयी नारी के उदात्त एवं दयनीय जीवन के विविध रूप, बाल-मन की सरलता-तरलता, राष्ट्र की अस्मिता-रक्षा हेतु प्राणोत्सर्ग करने वाले क्रान्तिवीरों के प्रति प्रणति, भ्रष्टाचार को नकारने का उद्दाम आक्रोश, उपलब्धियों की बुलन्दियों पर पहुँचने का अदम्य उत्साह और इन सबसे परे उनका मानवतावादी जीवन-दर्शन यत्र-तत्र-सर्वत्र लक्षित होता है। उनकी कविताएंँ, कहानियाँ, निबन्ध, बाल साहित्य, इतिहास लेखन सभी उनकी संवेदनशीलता, वैचारिक उत्कर्ष, ओजपूर्ण मनस्विता एवं मानवतावादी जीवन-दर्शन का साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं। पुस्तक के सुधी संपादक साहित्यकार दुर्गा चरण मिश्र के द्वारा कृष्ण कुमार यादव के बहुआयामी व्यक्तित्व पर आधारित मूल्यांकनपरक आलेखों, विद्वतजनों की सार्थक टिप्पणियों एवं श्री यादव की जीवन-गाथा सहेजती अट्ठासी छन्दों में विस्तारित कविता द्वारा इसे पठनीय एवं संग्रहणीय बनाने का प्रयास निःसंदेह सराहनीय है। प्रस्तुत पुस्तक कृष्ण कुमार यादव के प्रति समर्पित महत्वपूर्ण महानुभावों की भाव-सुमनांजलि से सुवासित है।

‘बढ़ते चरण शिखर की ओर‘ में कृष्ण कुमार यादव की रचनाओं के संदर्भ में विभिन्न विद्वानों की सम्मतियाँ उल्लेखनीय हैं। ये सम्मतियाँ उनकी रचनाधर्मिता के साथ-साथ व्यक्तित्व को भी विस्तार देती हैं। पुस्तक की भूमिका में प्रसिद्ध समालोचक सेवक वात्स्यायन लिखते हैं कि कृष्ण कुमार यादव अपने जीवन के अभी पूरे-पूरे तीन दशक ही देख सके हैं कि उनकी मेधा और निष्ठामय श्रम के उदात्त उदाहरण व्यवहारवादी जीवन-दर्शन से लेकर, सिद्धान्त-भूमियों से लेकर भावमय संसार तक प्रस्थित हो उठे हैं। उन्होंने साहित्य-जगत् में भी विविध आयामों में, विविध सोपानों में अपनी प्रतिभा-राशि का आंशिक और समुच्चयित किरण-विकीर्णन प्रस्तुत कर चमत्कृत भी किया है और भावाभिभूत भी। जानेमाने गीतकार व साहित्यकार गोपालदास ‘नीरज‘, कृष्ण कुमार यादव की रचनाओं में बुद्धि और हृदय का एक अपूर्व संतुलन महसूस करते हंै तो प्रो0 सूर्य प्रसाद दीक्षित के मत में कृष्ण कुमार के पास पर्याप्त भाव-सम्पदा है, जागृत संवेदना है, सक्षम काव्य-भाषा है और खुला आकाश है। डाॅ0 रामदरश मिश्र का अभिमत है कि कृष्ण कुमार की कविताएं सहज हैं, पारदर्शी हैं, अपने समय के सवालों और विसंगतियों से रूबरू हैं। चर्चित कवि यश मालवीय श्री यादव को उनके विभाग की भावभूमि से जोड़ते हुए लिखते हैं कि वास्तव में अपने रचना-कर्म में कृष्ण कुमार चिट्ठीरसा ही लगते हैं, जीवन और जगत को भावनाओं कल्पनाओं की रसभीनी चिट्ठी इधर से उधर पहुँचाते हुए। डाॅ0 गणेश दत्त सारस्वत उनकी निबंध-कला पर जोर देते हुए कहते हैं कि- कृष्ण कुमार के निबन्ध अनुभूतिपरक हैं, चिन्तन प्रधान हंै तथा दार्शनिकता का पुट लिए हुए हैं इसलिए सर्वस्पर्शी हैं। इससे परे डाॅ0 रामस्वरूप त्रिपाठी श्री यादव की रचनाओं में विमर्शों को खंगालते हुए व्यक्त करते हैं कि-स्त्री-विमर्श का यथार्थ, दलित चेतना की सोच कृष्ण कुमार की कविताओं में वर्तमान का सत्य बनकर उभरी हैं। वरिष्ठ कथाकार गोवर्धन यादव के मत में कृष्ण कुमार की कहानियों में प्रेम की मासूमियत, अन्तद्र्वन्द्व, व्यवस्था की विसंगतियाँ व समसामयिक घटनाओं के बहाने समकालीन सरोकारों को भी उकेरा गया है। आकांक्षा यादव तो रचनाधर्मिता को श्री यादव के व्यक्तित्व के अभिन्न अंग रूप में देखती हैं। रविनंदन सिंह इसे आगे बढ़ाते हुए लिखते हैं कि युवा कवि कृष्ण कुमार यादव ने नारी चेतना को आधुनिक संदर्भों से जोड़कर ग्रहण किया है। श्री यादव की रचनाओं पर साहित्यकारों की ही नहीं समाजसेवियों और राजनेताओं की भी दृष्टि गयी है। बतौर केन्द्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल-‘क्रान्ति यज्ञ‘ एक पुस्तक नहीं, बल्कि अपने आप में एक शोध ग्रन्थ है।

‘बढ़ते चरण शिखर की ओर‘ में कृष्ण कुमार यादव के जन्म से लेकर आज तक के 32 वर्षीय विकास-क्रम को शब्द-शिल्प से सजाया गया है। कृष्ण कुमार की कलम विद्यार्थी जीवन से ही चलने लगी। ‘हम नवोदय के बच्चे‘ बाल गीत से आरम्भ हुआ उनका काव्य सृजन कब और कैसे बढ़ता गया पता ही नहीं चला। कभी कल्पनाओं में, कभी प्रकृति के सौंदर्य तो कभी जीवन की सच्चाईयों व बहुरंगे अनुभवों से गुजरती हुई कविता इलाहाबाद में अध्ययन के दौरान गद्य की ओर भी उन्मुख हुई। नवोदय विद्यालय का अल्हड़ किशोर, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान देश-विदेश की गतिविधियों में रूचि लेने वाला जागरूक युवा छात्र बनकर उभरता है। पिताश्री के सपनों को साकार करने हेतु सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी में डूब जाता है और अपने आत्म-विश्वास के अनुरूप प्रथम प्रयास में ही सफलता अर्जित कर भारतीय डाक सेवा का उच्चाधिकारी बनता है। साहित्य-सृजन के लिए कलम उठाता है तो अल्पावधि में ही भारत की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में बहार बनकर छा जाता है। जीवन-संगिनी मिलती है वह भी कलम की सिपहसालार। ऐसा प्रतीत होता है कि कृष्ण कुमार ने जो भी सपना देखा, परमात्मा ने उसे अविलम्ब साकार कर दिया। उनकी बतरस की बाँसुरी से ऐसी मधुर एवं सुरीली स्वर लहरी प्रवाहित होती है कि श्रोता के पास रससिक्त होने के अतिरिक्त कोई विकल्प ही नहीं बचता।

कभी-कभी लगता है जैसे कृष्ण कुमार अपने नाम को सार्थक करने की आकांक्षा से प्रतिपल अनुप्राणित हैं। जीवन और जगत की विसंगतियों से टक्कर लेने की संवेदनशील छटपटाहट है। पुस्तक के संपादक दुर्गाचरण मिश्र जी ने कृष्ण कुमार यादव की रचनाओं के पृष्ठ भी इसके साथ संलग्न कर लिए होते, तो एक नयी काव्य-विधा का ‘कुमार कृष्णायन‘ बनकर तैयार हो जाता। खैर, महाभारत जैसी रचनाएं तो शनैः शनैः अपना आकार-विस्तार प्राप्त करती हैं। अन्त में मैं कृष्ण कुमार यादव के कृतित्व को अपनी भाव-सुमनांजलि अर्पित करते हुए एक श्लोक उद्धृत करने की अनुमति चाहता हूँ।

जयन्ति ते सृकृतिनः रससिद्धाः

यशःकाये जरामरणजं भयम्।।

कृतिः बढ़ते चरण शिखर की ओर सम्पादकः दुर्गाचरण मिश्र, पृष्ठः 148 मूल्यः रू0 150 संस्करणः 2009 प्रकाशकः उमेश प्रकाशन, 100, लूकरगंज, इलाहाबाद समीक्षकः राजकुमार अवस्थी, प्रधानाचार्य (से0नि0), नरवल, कानपुर-209401